गुरुवार, 24 जुलाई 2025

गिद्ध (Vultures) लाशों (Corpses or Dead bodies) को नहीं ढूंढते बल्कि लाशें गिद्धों को बुलाती हैं: डॉ. प्रदीप सोलंकी

गिद्ध लाशों को नहीं ढूंढते, बल्कि लाशें गिद्धों को बुलाती हैं: डॉ. प्रदीप सोलंकी

Vultures do not look for corpses, but corpses call vultures: Dr. Pradeep Solanki

सुनने में अजीब लग सकता है पर हाँ, यह सही है। सड़ती हुई लाश से निकलने वाले रसायन गिद्धों को बहुत आकर्षित करते हैं। सड़ती हुई लाश से निकलने वाले रसायन, जैसे कि एथिल मर्कैप्टन और अन्य वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs), गिद्धों को आकर्षित करते हैं क्योंकि उनकी गंध संवेदनशीलता बहुत तीव्र होती है। ये रसायन मृत शरीर के विघटन के दौरान उत्पन्न होते हैं, और गिद्ध इन्हें दूर से सूंघ सकते हैं।

खासकर गिद्धों को जानवरों का भेजा (Brain) बहुत पसंद होता है।

गिद्धों का दिमाग (brain) की ओर आकर्षण इसलिए हो सकता है क्योंकि यह उच्च पोषक तत्वों वाला हिस्सा होता है, जिसमें वसा और प्रोटीन प्रचुर मात्रा में होते हैं। गिद्धों की शारीरिक संरचना और पाचन तंत्र इस तरह विकसित हुए हैं कि वे सड़ते हुए मांस को आसानी से पचा सकते हैं, जो अन्य जानवरों के लिए हानिकारक हो सकता है।

ये एथिल मरकैप्टन क्या है और ये कैसे बनता है? लाशों से इनका क्या संबंध है?

आइये इसे हम बिंदुवार समझने का प्रयास करेंगे -

एथिल मर्कैप्टन (Ethyl Mercaptan)

एथिल मर्कैप्टन (C₂H₅SH), जिसे एथेनथियोल भी कहा जाता है, एक वाष्पशील कार्बनिक यौगिक है। यह सल्फर युक्त यौगिक है, जिसकी गंध बहुत तीखी और अप्रिय होती है, जो सड़े हुए प्याज या गंधक जैसी होती है। यह गंध इतनी तेज होती है कि इसे मनुष्य और जानवर, जैसे गिद्ध, बहुत कम मात्रा में भी सूंघ सकते हैं। इसकी यह विशेषता इसे गिद्धों के लिए आकर्षक बनाती है।

एथिल मर्कैप्टन कैसे बनता है?

एथिल मर्कैप्टन मृत शरीर (लाश) के विघटन (decomposition) की प्रक्रिया के दौरान बनता है। जब कोई जानवर या इंसान मरता है, तो शरीर के ऊतकों (tissues) में मौजूद प्रोटीन और अन्य कार्बनिक पदार्थ बैक्टीरिया और एंजाइमों द्वारा टूटने लगते हैं। इस प्रक्रिया में बैक्टीरियल एवं रासायनिक प्रक्रिया के दौरान प्रोटीन टूटती है, जैसे कि -

प्रोटीन का विघटन: प्रोटीन, विशेष रूप से सल्फर युक्त अमीनो एसिड (जैसे सिस्टीन और मेथियोनीन), टूटकर सल्फर युक्त यौगिक बनाते हैं।

बैक्टीरियल क्रिया: एनारोबिक बैक्टीरिया (जो ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में कार्य करते हैं) सल्फर युक्त यौगिकों को एथिल मर्कैप्टन जैसे थियोल्स में परिवर्तित करते हैं।

रासायनिक प्रतिक्रियाएँ: विघटन के दौरान मिथेन और सल्फर युक्त यौगिकों के संयोजन से एथिल मर्कैप्टन बनता है। यह प्रक्रिया खासकर सड़न के शुरुआती चरणों में तेजी से होती है।

लाशों से इसका क्या संबंध है?

लाशों के विघटन के दौरान एथिल मर्कैप्टन और अन्य वाष्पशील सल्फर यौगिकों का उत्सर्जन होता है, जो हवा में फैलकर एक विशिष्ट गंध पैदा करते हैं। गिद्धों की गंध संवेदनशीलता इतनी तीव्र होती है कि वे इन रसायनों को कई किलोमीटर दूर से भी पहचान लेते हैं। यह गंध गिद्धों को मृत शरीर की लोकेशन तक खींच लाती है। खासकर शुरुआती सड़न (putrefaction) के चरण में, जब ऊतक तेजी से टूटते हैं, एथिल मर्कैप्टन की मात्रा अधिक होती है, जो गिद्धों के लिए एक मजबूत संकेत (cue) का काम करती है।

अतिरिक्त जानकारी: क्या यह कहीं और भी उपयोग में आता है ?

एथिल मर्कैप्टन का उपयोग कृत्रिम रूप से भी किया जाता है, जैसे कि प्राकृतिक गैस (जो स्वाभाविक रूप से गंधहीन होती है) में गंध जोड़ने के लिए, ताकि गैस रिसाव का पता लगाया जा सके। आपके घर में जब भी कुकिंग गैस का रिसाव होता है, तब इसी की बदबू होती है। हमारे घरों में सप्लाई होने वाले गैस सिलेंडर में गैस रिसाव का पता लगाने के लिए एथिल मर्कैप्टन की कुछ मात्रा मिलायी जाती है

गिद्धों के अलावा, कुछ अन्य मांसाहारी या सड़नखोर जीव (scavengers) भी इस गंध की ओर आकर्षित होते हैं, लेकिन गिद्धों की सूंघने की क्षमता विशेष रूप से उन्नत होती है।

एथिल मर्कैप्टन का पारिस्थितिक प्रभाव

पारिस्थितिकी तंत्र में सड़नखोर जीवों की भूमिका:
एथिल मर्कैप्टन और अन्य सल्फर युक्त यौगिक, जो सड़न की प्रक्रिया में बनते हैं, पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण हैं। ये यौगिक सड़नखोर जीवों (scavengers) जैसे गिद्धों, सियारों, और कुछ कीड़ों को मृत शरीर की ओर आकर्षित करते हैं, जिससे मृत पदार्थ का तेजी से निपटान होता है। यह प्रक्रिया पर्यावरण को साफ रखने में मदद करती है, क्योंकि सड़ते हुए शरीर रोगजनक बैक्टीरिया, वायरस, और कवक (fungi) के प्रसार को फैला सकते हैं। गिद्ध जैसे जीव इन लाशों को खाकर बीमारी फैलने की संभावना को कम करते हैं। 
उदाहरण: गिद्धों का पाचन तंत्र इतना शक्तिशाली होता है कि वे हैजा, बोटुलिज्म, और अन्य रोग पैदा करने वाले बैक्टीरिया को नष्ट कर देते हैं, जिससे बीमारियों का खतरा कम होता है।

पोषक तत्वों का चक्रण:
सड़नखोर जीवों के माध्यम से एथिल मर्कैप्टन का उत्सर्जन सड़न की प्रक्रिया का हिस्सा है, जो पोषक तत्वों (जैसे नाइट्रोजन, फास्फोरस) को मिट्टी में वापस लौटाता है। यह मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाता है और पौधों के लिए पोषक तत्व (जैसे नाइट्रोजन, फास्फोरस) उपलब्ध कराता है। कीड़े और सूक्ष्मजीव (microorganisms) सड़नखोरों के साथ मिलकर इस प्रक्रिया को और तेज करते हैं।

प्राकृतिक संकेतक:
यह रसायन गिद्धों जैसे सड़नखोरों के लिए एक प्राकृतिक संकेतक का काम करता है, जो पारिस्थितिकी तंत्र में संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। बिना इन रसायनों के, सड़नखोरों को भोजन ढूंढने में कठिनाई हो सकती है, जिससे सड़न की प्रक्रिया धीमी हो सकती है।

मानव प्रभाव:
प्राकृतिक रूप से बनने वाला एथिल मर्कैप्टन पर्यावरण के लिए हानिकारक नहीं है, लेकिन इसकी तीखी गंध मनुष्यों के लिए असुविधाजनक हो सकती है। साथ ही, कृत्रिम रूप से इसका उपयोग (जैसे गैस रिसाव का पता लगाने में) पर्यावरण में रासायनिक प्रदूषण को कम करने में मदद करता है।

गिद्धों की शारीरिक संरचना
गिद्धों की शारीरिक संरचना उन्हें सड़नखोर (scavenger) के रूप में अत्यंत कुशल बनाती है, और एथिल मर्कैप्टन जैसे रसायनों को पहचानने में उनकी विशेषताएँ महत्वपूर्ण हैं:

गंध संवेदनशीलता:
गिद्धों की सूंघने की क्षमता असाधारण होती है। विशेष रूप से टर्की गिद्ध (Turkey Vulture: Cathartes aura) जैसे प्रजातियों में गंध ग्रंथि (olfactory bulb) अत्यधिक विकसित होती है, जो उन्हें एथिल मर्कैप्टन जैसी गंध को मीलों दूर से पहचानने में सक्षम बनाती है। उनकी नाक में विशेष संवेदी कोशिकाएँ होती हैं, जो सड़न के दौरान निकलने वाले वाष्पशील यौगिकों को पकड़ लेती हैं।

पाचन तंत्र:
गिद्धों का पाचन तंत्र अत्यंत शक्तिशाली होता है। गिद्धों का पेट अत्यंत अम्लीय होता है (pH 1-2) उनके पेट में मौजूद हाइड्रोक्लोरिक एसिड और एंजाइम सड़ते हुए मांस में मौजूद रोगजनक बैक्टीरिया (जैसे साल्मोनेला, क्लॉस्ट्रिडियम) को नष्ट कर देते हैं। यह उन्हें सड़ा हुआ मांस, जिसमें दिमाग (brain) जैसे उच्च वसा युक्त हिस्से शामिल हैं, खाने में सक्षम बनाता है। 

शारीरिक अनुकूलन:
गिद्धों का सिर गंजा होता है, जिससे मांस खाते समय बैक्टीरिया और गंदगी उनके सिर पर नहीं चिपकती। यह स्वच्छता बनाए रखने में मदद करता है। उनकी चोंच तेज और मजबूत होती है, जो मांस को आसानी से फाड़ सकती है, खासकर नरम ऊतकों जैसे दिमाग को।

उड़ान और दृष्टि:
गिद्ध ऊँचाई पर उड़ते समय थर्मल हवाओं का उपयोग करते हैं, जिससे वे कम ऊर्जा में लंबी दूरी तय कर सकते हैं। उनकी तेज दृष्टि मृत शरीर को देखने में मदद करती है, लेकिन गंध उनकी प्राथमिक खोज विधि है।

गिद्धों और एथिल मर्कैप्टन का संबंध
एथिल मर्कैप्टन गिद्धों के लिए एक रासायनिक संकेत (chemical cue) है, जो उन्हें मृत शरीर तक ले जाता है। यह गंध सड़न के पहले 24-48 घंटों में सबसे तीव्र होती है, जब विघटन की प्रक्रिया शुरू होती है। गिद्धों का दिमाग (brain) की ओर आकर्षण इसलिए हो सकता है क्योंकि यह हिस्सा वसा और प्रोटीन से भरपूर होता है, जो उनकी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करता है।

में यहाँ गिद्धों की प्रजातियों, उनके संरक्षण की स्थिति, और पर्यावरण में उनकी उल्लेखनीय भूमिका के बारे में भी बात करना चाहूँगा:

गिद्ध बड़े मांसभक्षी पक्षियों की 22 प्रजातियों में से एक है जो मुख्यतः उष्ण कटिबंधीय और उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं। इन्हें एक्सीपिट्रिफॉर्मिस क्रम के अंतर्गत एक्सीपिट्रिडे (पुरानी दुनिया के गिद्ध) और कैथार्टिडे (नई दुनिया के गिद्ध) परिवारों में वर्गीकृत किया गया है। नई दुनिया के गिद्धों की 7 प्रजातियों में शामिल हैं: कोंडोर्स, और 15 पुरानी दुनिया की प्रजातियों में शामिल हैंलैमर्जियर और ग्रिफ़ॉन गिद्ध। हालाँकि दोनों समूहों के कई सदस्य समान दिखते हैं, लेकिन वे केवल दूर से ही संबंधित हैं।

भारत में गिद्धों की नौ प्रजातियाँ पाई जाती हैं, लेकिन दुर्भाग्य से, उनमें से कई अब आवास के नुकसान और मवेशियों पर इस्तेमाल होने वाली डाइक्लोफेनाक नामक दवा के ज़हर जैसी समस्याओं के कारण लुप्तप्राय हैं। गिद्ध मृत पशुओं से होने वाली बीमारियों को फैलने से रोककर प्रकृति को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

हालाँकि गिद्धों की बहुत सारी जानकारी सड़नखोर जीवों की भूमिका, पर्यावरण की स्वच्छता तथा पोषक तत्वों का चक्रण (Nutrient Recycling) के बारे में इस लेख में एथिल मर्कैप्टन के साथ साथ पहले ही जान चुके हैं फिर भी कुछ बातों को जानना जरुरी है  

पारिस्थितिकी तंत्र में संतुलन

सड़नखोर जीव खाद्य श्रृंखला (food chain) का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। वे शिकारियों (predators) द्वारा छोड़े गए अवशेषों को साफ करते हैं और प्राकृतिक संसाधनों का पुनर्चक्रण करते हैं। ये जीव अन्य सड़नखोरों और शिकारियों के बीच प्रतिस्पर्धा को भी नियंत्रित करते हैं। उदाहरण के लिए, गिद्ध तेजी से मृत शरीर को खा लेते हैं, जिससे अन्य छोटे सड़नखोरों को भोजन के लिए इंतजार करना पड़ता है।

गंध के माध्यम से खोज
सड़नखोर जीव, जैसे गिद्ध, एथिल मर्कैप्टन जैसे वाष्पशील रसायनों की गंध का उपयोग करके मृत शरीरों का पता लगाते हैं। यह उनकी खोज प्रक्रिया को कुशल बनाता है, जिससे वे बड़े क्षेत्रों में फैले भोजन को ढूंढ सकते हैं। यह प्रक्रिया पर्यावरण में सड़न को तेजी से कम करती है, क्योंकि ये जीव मृत शरीर को जल्दी खा लेते हैं।

जैव विविधता में योगदान
सड़नखोर जीव विभिन्न प्रजातियों के बीच संतुलन बनाए रखते हैं। उदाहरण के लिए, गिद्धों की उपस्थिति मृत शरीरों पर निर्भर अन्य छोटे सड़नखोरों, जैसे मक्खियों या चीटियों, की आबादी को नियंत्रित करती है। उनकी अनुपस्थिति से कुछ प्रजातियों की अत्यधिक वृद्धि हो सकती है, जो पारिस्थितिकी तंत्र को असंतुलित कर सकती है।

मानव स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
सड़नखोर जीव, विशेष रूप से गिद्ध, मृत पशुओं को हटाकर पशुपालकों और किसानों को मृत शरीरों के निपटान की लागत से बचाते हैं। भारत जैसे देशों में, गिद्धों की संख्या में कमी (विशेषकर डाइक्लोफेनाक दवा के उपयोग के कारण) से आवारा कुत्तों और चूहों की आबादी बढ़ी, जिससे रेबीज जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ गया।

विशेष उदाहरण: गिद्धों की भूमिका
गिद्ध सड़नखोरों में सबसे कुशल माने जाते हैं। वे एक मृत शरीर को कुछ ही घंटों में साफ कर सकते हैं। उनकी तेज उड़ान और गंध संवेदनशीलता उन्हें बड़े क्षेत्रों में मृत शरीर ढूंढने में मदद करती है। भारत में गिद्धों की कमी ने पारिस्थितिकी और मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाला, जिसके बाद गिद्ध संरक्षण कार्यक्रम शुरू किए गए।

चुनौतियाँ
सड़नखोर जीवों की आबादी पर खतरा बढ़ रहा है, जैसे कि गिद्धों पर कीटनाशकों, दवाओं (जैसे डाइक्लोफेनाक), और आवास नष्ट होने का प्रभाव। इनके संरक्षण की कमी से पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन हो सकता है, जिससे सड़न की प्रक्रिया धीमी हो सकती है और रोग फैलने का खतरा बढ़ सकता है।

निष्कर्ष 

जीवविज्ञान का विद्यार्थी होने के नाते में सभी विद्यार्थिओं एवं आमजन को इसे पढने के लिए जरुर कहूँगा एथिल मर्कैप्टन, गिद्ध, और अपराध विज्ञान का शोधपरक एवं मानवीय महत्व है, क्योंकि एथिल मर्कैप्टन, एक तीखी गंध वाला रसायन तथा सड़न की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो गिद्धों जैसे सड़नखोर जीवों को मृत शरीरों की ओर आकर्षित करता है। यह शोधपरक अध्ययन न केवल जैविक और रासायनिक प्रक्रियाओं को समझने में मदद करता है, बल्कि अपराध विज्ञान में भी इसकी संभावित भूमिका को उजागर करता है। गिद्धों की असाधारण गंध संवेदनशीलता, जो एथिल मर्कैप्टन जैसे यौगिकों पर निर्भर करती है, फोरेंसिक विज्ञान में शवों की खोज और मृत्यु के समय के अनुमान को बेहतर बनाने में प्रेरणा दे सकती है। शोधपत्र, जैसे कि DeVault et al. (2004) और Vass (2012), इस बात को रेखांकित करते हैं कि सड़न के रसायनों और गिद्धों के व्यवहार का अध्ययन न केवल पारिस्थितिकी, बल्कि फोरेंसिक जांच में भी क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है।

मानवीय दृष्टिकोण से, गिद्धों का संरक्षण और उनके पारिस्थितिक महत्व को समझना हमें पर्यावरण संतुलन और जैव विविधता के प्रति जागरूक बनाता है। गिद्ध, जो सड़नखोर के रूप में पर्यावरण को स्वच्छ रखते हैं, मानव स्वास्थ्य और रोग नियंत्रण में भी योगदान देते हैं। भारत जैसे देशों में डाइक्लोफेनाक दवा के कारण गिद्धों की घटती आबादी ने हमें उनके संरक्षण की आवश्यकता सिखाई है। संरक्षण तकनीकें, जैसे कैप्टिव ब्रीडिंग और वुल्चर सेफ जोन, न केवल गिद्धों को बचाने में मदद करती हैं, बल्कि मानव और प्रकृति के बीच सह-अस्तित्व को बढ़ावा देती हैं। यह विषय विद्यार्थियों को विज्ञान, पर्यावरण, और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संबंध को समझने के लिए प्रेरित करता है।

गिद्धों और एथिल मर्कैप्टन की कहानी एक आकर्षक उदाहरण है कि कैसे प्रकृति और विज्ञान मिलकर मानव जीवन को बेहतर बना सकते हैं। साथ ही, इस रसायन और गिद्धों के व्यवहार का अध्ययन अपराध विज्ञान में शवों की खोज और जांच को बेहतर बनाने की संभावनाएँ खोलता है। यह विषय विद्यार्थियों को रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, और फोरेंसिक विज्ञान जैसे क्षेत्रों में गहरी रुचि जगाता है, साथ ही पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता के प्रति जिम्मेदारी का बोध कराता है। मुझे आशा है कि यह लेख विद्यार्थियों के लिए प्रेरणास्रोत का कार्य करेगा। इस लेख को पढ़कर आप न केवल यह समझेंगे कि एक छोटा सा रसायन कैसे गिद्धों और अपराध जांच को जोड़ता है, बल्कि यह भी सीखेंगे कि प्रकृति के रहस्य वैज्ञानिक अनुसंधान के माध्यम से मानव समाज की मदद कैसे कर सकते हैं। यह आपको पर्यावरण संरक्षण, फोरेंसिक विज्ञान, और वैज्ञानिक खोजों में करियर की संभावनाओं के बारे में सोचने के लिए प्रेरित करेगा। गिद्धों की कहानी पढ़ें और जानें कि कैसे प्रकृति और विज्ञान मिलकर एक स्वस्थ और सुरक्षित दुनिया बना सकते हैं!

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टिप्पणी:-

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लेखक:-

डॉ. प्रदीप सोलंकी 

 

"मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ।" - डेसकार्टेस 

विज्ञान शिक्षक, शिक्षाविद, प्राणिविद, पर्यावरणविद, ऐस्ट्रोनोमर, करिअर-काउन्सलर, ब्लॉगर, यूट्यूबर, एवं पूर्व सदस्य टीचर्स हैन्ड्बुक कमिटी सीएम राइज़ स्कूल्स एवं पीएम श्री स्कूल्स परियोजना तथा पर्यावरण शिक्षण समिति, माध्यमिक शिक्षा मण्डल भोपाल मध्यप्रदेश 



3 टिप्‍पणियां:

  1. वैज्ञानिक गिद्धों की विशेषज्ञता को कुशल सफाईकर्मियों के रूप में उजागर करते हैं , जो मृत पशुओं का मांस खाकर तथा बीमारियों के प्रसार को रोककर पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । वे प्रकृति के "सफाई दल" हैं, जिनमें रोगाणुओं को निष्क्रिय करने के लिए मजबूत पेट के एसिड जैसे अद्वितीय अनुकूलन होते हैं। हालाँकि, डाइक्लोफेनाक विषाक्तता जैसे कारकों के कारण उनकी आबादी में महत्वपूर्ण गिरावट आई है , जिससे संरक्षण प्रयासों की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है।

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  2. वैज्ञानिकों ने डाइक्लोफेनाक जैसी पशु चिकित्सा दवाओं के उपयोग के कारण, विशेष रूप से दक्षिण एशिया में, गिद्धों की आबादी में भारी गिरावट दर्ज की है। इस गिरावट ने पारिस्थितिकीय और यहां तक कि सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं भी पैदा कर दी हैं।

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  3. 1994 से पहले, सर्वेक्षण किए गए ज़िलों में मानव मृत्यु दर औसतन प्रति 1000 लोगों पर लगभग 0.9% थी, जो इस बात का आधार थी कि किसी विशेष ज़िले में गिद्धों की संख्या कितनी है। लेकिन 2005 के अंत तक, जिन क्षेत्रों में पारंपरिक रूप से गिद्धों की संख्या ज़्यादा थी, वहाँ मानव मृत्यु दर में औसतन 4.7% की वृद्धि देखी गई, यानी प्रति वर्ष लगभग 104,386 अतिरिक्त मौतें हुईं। इस बीच, जिन ज़िलों में गिद्धों का सामान्य निवास नहीं था, वहाँ मृत्यु दर 0.9% पर स्थिर रही।

    मौद्रिक क्षति की गणना के लिए, टीम ने पिछले शोध का सहारा लिया, जिसमें भारतीय समाज द्वारा एक जीवन बचाने के लिए खर्च की जाने वाली राशि का आर्थिक मूल्य लगभग 665,000 डॉलर प्रति व्यक्ति आंका गया था। इससे पता चलता है कि 2000 से 2005 तक गिद्धों की आबादी में कमी से होने वाली कुल आर्थिक क्षति 69.4 बिलियन डॉलर प्रति वर्ष थी।

    भूमध्यसागरीय अध्ययन संस्थान के संरक्षण वैज्ञानिक एंड्रिया सांतांगेली, जो इस शोध से जुड़े नहीं थे, कहते हैं कि ये आँकड़े अपने आप में आश्चर्यजनक नहीं हैं। उन्होंने और अन्य लोगों ने दशकों से जैव विविधता के नुकसान पर चिंता जताई है। लेकिन वे कहते हैं कि नए, नाटकीय आँकड़े सांसदों को कार्रवाई के लिए राजी करने में मदद कर सकते हैं। "अगर आप उन्हें आकर्षक आँकड़े देते हैं, तो नीति और संरक्षण उपायों को आगे बढ़ाना शायद आसान हो जाता है।"

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